श्राद्ध पक्ष 2026: पितरों को समर्पित पवित्र समय, पिंडदान की परंपरा और माता सीता की गया जी की कथा

श्राद्ध पक्ष 2026 कब है? पितृ पक्ष की मान्यता क्या है? पिंडदान क्यों किया जाता है? गया जी में पिंडदान का क्या महत्व है? माता सीता ने किसके लिए पिंडदान किया था?
भारतीय सनातन परंपरा में जिस तरह देवी-देवताओं की पूजा का महत्व है, उसी तरह अपने पूर्वजों और पितरों का स्मरण करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदू धर्म में वर्ष का एक विशेष समय ऐसा आता है जब लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं और उनके लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोज, गौ सेवा और दान-पुण्य करते हैं।
इसी अवधि को पितृ पक्ष, श्राद्ध पक्ष या महालय पक्ष कहा जाता है।
मान्यता है कि यह समय केवल कर्मकांड का नहीं बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और स्मरण का समय है। हम आज जो कुछ हैं, उसमें हमारे माता-पिता और उनसे पहले आने वाली पीढ़ियों का योगदान रहा है। इसलिए पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों और अपने परिवार की परंपरा से जोड़ने का अवसर देता है।
श्राद्ध पक्ष 2026 कब से शुरू होगा?
साल 2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर 2026 तक रहेगा। अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या, जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है, मनाई जाएगी।
इसे लेकर कभी-कभी भ्रम होता है कि श्राद्ध सितंबर में है या अक्टूबर में। वास्तव में 2026 में पितृ पक्ष दोनों महीनों में पड़ रहा है।
श्राद्ध पक्ष 2026 की प्रमुख तिथियां
| तिथि | ||
| 27 सितंबर 2026 | रविवार | प्रतिपदा श्राद्ध |
| 28 सितंबर 2026 | सोमवार | द्वितीया श्राद्ध |
| 29 सितंबर 2026 | मंगलवार | तृतीया श्राद्ध |
| 30 सितंबर 2026 | बुधवार | पंचमी श्राद्ध |
| 1 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | षष्ठी श्राद्ध |
| 2 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | सप्तमी श्राद्ध |
| 3 अक्टूबर 2026 | शनिवार | अष्टमी श्राद्ध |
| 4 अक्टूबर 2026 | रविवार | नवमी / मातृ नवमी |
| 5 अक्टूबर 2026 | सोमवार | दशमी श्राद्ध |
| 6 अक्टूबर 2026 | मंगलवार | एकादशी श्राद्ध |
| 7 अक्टूबर 2026 | बुधवार | द्वादशी श्राद्ध |
| 8 अक्टूबर 2026 | गुरुवार | त्रयोदशी श्राद्ध |
| 9 अक्टूबर 2026 | शुक्रवार | चतुर्दशी श्राद्ध |
| 10 अक्टूबर 2026 | शनिवार | सर्वपितृ अमावस्या / महालय अमावस्या |
तिथियों के स्थानीय पंचांग और स्थान के अनुसार सूक्ष्म अंतर हो सकते हैं, इसलिए किसी विशेष श्राद्ध के मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग देखना उचित है। उदाहरण के लिए, पंचमी श्राद्ध 2026 के लिए 30 सितंबर की तिथि दी गई है और श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप, रौहिण तथा अपराह्न काल महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
पितृ पक्ष क्या होता है?
'पितृ' का अर्थ केवल पिता नहीं है। सनातन परंपरा में पितृ शब्द उन दिवंगत पूर्वजों के लिए भी प्रयोग किया जाता है जिन्होंने हमारे परिवार और वंश को आगे बढ़ाया।
पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनके नाम से जल अर्पित करते हैं, भोजन कराते हैं, पिंडदान करते हैं और जरूरतमंदों को दान देते हैं।
श्राद्ध शब्द 'श्रद्धा' से जुड़ा माना जाता है। अर्थात किसी कर्म को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के साथ करना।
इसीलिए पितृ पक्ष का सबसे बड़ा संदेश है—
पूर्वजों को केवल याद करना नहीं, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञ होना।
एक पुरानी मान्यता: पितरों के लिए खुलते हैं स्वर्ग के द्वार
पितृ पक्ष से जुड़ी भारतीय लोकमान्यताओं में एक अत्यंत भावपूर्ण विश्वास मिलता है।
कहा जाता है कि वर्ष के इस विशेष समय में पितृलोक और पृथ्वीलोक के बीच का संबंध अधिक निकट हो जाता है। मान्यता है कि पितरों के लिए स्वर्ग के द्वार खुलते हैं और वे अपने वंशजों को देखने तथा उनके द्वारा श्रद्धापूर्वक किए गए अन्न, जल और दान को स्वीकार करने के लिए पृथ्वी लोक की ओर आते हैं।
इसी कारण अनेक परिवारों में यह विश्वास पीढ़ियों से सुनाया जाता रहा है कि—
“पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज हमारे घर आते हैं।”
यह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास का विषय है। इसे वैज्ञानिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि सनातन परंपरा में चली आ रही आध्यात्मिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए।
इस मान्यता के अनुसार पितरों को केवल भोजन नहीं दिया जाता, बल्कि उनके नाम से किया गया अन्नदान, जलदान, वस्त्रदान और अन्य पुण्य कर्म भी उनके प्रति समर्पित किए जाते हैं।
पितरों को भोजन कैसे पहुंचता है?
यह प्रश्न सदियों से लोगों के मन में रहा है कि यदि हमारे पूर्वज शरीर रूप में हमारे सामने नहीं हैं तो उनके नाम से दिया गया भोजन उन्हें कैसे प्राप्त होता है?
सनातन परंपरा इसका उत्तर आध्यात्मिक रूप से देती है। मान्यता है कि श्राद्ध में अर्पित वस्तुएं केवल भौतिक भोजन नहीं होतीं, बल्कि श्रद्धा, संकल्प और पुण्य के माध्यम से पितरों तक पहुंचती हैं।
इसी कारण श्राद्ध के दौरान भोजन और दान को बहुत महत्व दिया जाता है।
कई परिवारों में श्राद्ध का भोजन सबसे पहले गाय, कौए, कुत्ते आदि को खिलाया जाता है। इसे पंचबली की परंपरा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इन जीवों को भोजन कराने से पितरों तक अर्पण पहुंचता है।
कौए को विशेष रूप से पितरों का प्रतीक या संदेशवाहक मानने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
श्राद्ध और पिंडदान में क्या अंतर है?
अक्सर लोग श्राद्ध और पिंडदान को एक ही समझते हैं, लेकिन दोनों में अंतर है।
श्राद्ध
श्राद्ध एक व्यापक धार्मिक कर्म है जिसमें—
- पितरों का स्मरण
- संकल्प
- तर्पण
- पिंड अर्पण
- भोजन
- दान
- ब्राह्मण भोजन
- प्रार्थना
जैसे कर्म शामिल हो सकते हैं।
पिंडदान
पिंडदान में सामान्यतः चावल आदि से बनाए गए पिंडों को पितरों के नाम से अर्पित किया जाता है।
पिंड को केवल भोजन का गोला नहीं माना जाता। धार्मिक परंपरा में यह दिवंगत व्यक्ति के प्रति श्रद्धा, स्मरण और तृप्ति का प्रतीक माना जाता है।
गरुड़ पुराण की परंपरा में पिंड और पूर्वजों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म का विस्तार से वर्णन मिलता है। गया में श्राद्ध और पिंडदान को विशेष फलदायी माना गया है।
गया जी में पिंडदान का इतना महत्व क्यों है?
भारत के सबसे प्रसिद्ध पितृ तीर्थों में गया जी का नाम सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है।
बिहार का गया शहर फल्गु नदी के किनारे स्थित है और हिंदू परंपरा में इसे पितरों के लिए पिंडदान का अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। गया में स्थित विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी, सीता कुंड और अक्षयवट पिंडदान परंपरा से विशेष रूप से जुड़े हुए हैं।
गया जी की धार्मिक परंपरा में यह विश्वास है कि भगवान विष्णु के चरण यहां विराजमान हैं और उनके चरणों के निकट पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष और शांति की प्राप्ति होती है।
गरुड़ पुराण के एक प्राचीन वर्णन में भी गया में श्राद्ध को पितरों की मुक्ति से जोड़ा गया है।
माता सीता ने गया जी में किया था पिंडदान
गया जी की सबसे प्रसिद्ध और भावपूर्ण कथाओं में माता सीता द्वारा राजा दशरथ के पिंडदान की कथा आती है।
यह कथा रामायण से जुड़ी लोक-धार्मिक परंपरा में अत्यंत प्रसिद्ध है।
मान्यता के अनुसार वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गया क्षेत्र पहुंचे थे। वहां राजा दशरथ के लिए पिंडदान करने का विचार हुआ।
भगवान राम आवश्यक सामग्री लेने चले गए और माता सीता फल्गु नदी के किनारे प्रतीक्षा करने लगीं।
इसी दौरान मान्यता के अनुसार राजा दशरथ की आत्मा ने माता सीता से पिंडदान करने का आग्रह किया।
माता सीता के पास उस समय पारंपरिक पिंड बनाने की सामग्री नहीं थी।
तब उन्होंने फल्गु नदी की रेत से पिंड बनाकर राजा दशरथ को अर्पित किया।
गया के सीता कुंड को आज भी उसी परंपरा से जोड़ा जाता है और सरकारी पर्यटन स्रोत भी इसे वह स्थान बताते हैं जहां मान्यता के अनुसार माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था।
माता सीता और फल्गु नदी की कहानी
इस कथा का एक और अत्यंत रोचक भाग है।
कहा जाता है कि माता सीता ने अपने द्वारा किए गए पिंडदान की घटना के साक्षी के रूप में कुछ तत्वों को गवाह बनाया था।
लोककथा के विभिन्न संस्करणों में गवाहों की संख्या और नामों में अंतर मिलता है, लेकिन प्रमुख रूप से फल्गु नदी और अक्षयवट का उल्लेख मिलता है।
कथा के अनुसार जब भगवान राम वापस लौटे तो उन्होंने माता सीता की बात पर आश्चर्य किया। तब माता सीता ने अपने साक्षियों से सत्य बताने को कहा।
मान्यता के अनुसार अधिकांश साक्षियों ने सत्य का साथ नहीं दिया, जबकि अक्षयवट ने माता सीता के सत्य की पुष्टि की।
इससे प्रसन्न होकर माता सीता ने अक्षयवट को अमर होने का आशीर्वाद दिया।
गया जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी स्थानीय परंपरा के अनुसार बताती है कि फल्गु नदी को माता सीता के श्राप से भूमिगत बहने वाली नदी माना जाता है और अक्षयवट को माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है।
आज भी गया जी आने वाले श्रद्धालु सीता कुंड, फल्गु नदी और अक्षयवट को पितृ कर्म की यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
फल्गु नदी क्यों दिखाई देती है सूखी?
गया की फल्गु नदी से जुड़ी यह परंपरा भी बेहद अनोखी है।
गया जिला प्रशासन के अनुसार, मानसून के अलावा कई समय फल्गु नदी का ऊपरी तल सूखा दिखाई देता है, जबकि रेत के नीचे पानी मिल सकता है। धार्मिक मान्यता इसे माता सीता के श्राप से जोड़ती है।
इसलिए फल्गु नदी को गया की पितृ परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है।
यहां आने वाला श्रद्धालु केवल एक नदी के किनारे नहीं आता, बल्कि वह उस धार्मिक कथा और परंपरा से जुड़ता है जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
पितृ पक्ष में किन-किन लोगों का श्राद्ध किया जाता है?
पितृ पक्ष में परिवार के दिवंगत सदस्यों के लिए उनकी मृत्यु की तिथि यानी संबंधित तिथि पर श्राद्ध करने की परंपरा है।
इनमें शामिल हो सकते हैं—
- पिता
- माता
- दादा-दादी
- परदादा-परदादी
- नाना-नानी
- अन्य पूर्वज
- परिवार के दिवंगत सदस्य
यदि किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या को उनके लिए श्राद्ध करने की परंपरा है। अमावस्या श्राद्ध को ऐसे पूर्वजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है।
मातृ नवमी का विशेष महत्व
पितृ पक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है।
यह दिन विशेष रूप से दिवंगत माता, दादी, नानी तथा परिवार की अन्य दिवंगत महिलाओं के श्राद्ध से जोड़ा जाता है।
परंपरा में इसे मातृ ऋण को याद करने का विशेष दिन माना गया है।
मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए इससे अधिक भावुक अवसर शायद ही कोई हो।
सर्वपितृ अमावस्या क्या है?
पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है—
सर्वपितृ अमावस्या
इसे महालय अमावस्या, पितृ अमावस्या या सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है।
2026 में यह 10 अक्टूबर, शनिवार को होगी।
यह दिन उन सभी ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया।
इसीलिए कई परिवार पितृ पक्ष की अंतिम अमावस्या पर अपने सभी पूर्वजों का सामूहिक स्मरण करते हैं।
श्राद्ध में क्या-क्या किया जाता है?
परंपरा और परिवार की मान्यता के अनुसार विधि अलग-अलग हो सकती है, लेकिन सामान्य रूप से श्राद्ध में निम्न कर्म किए जाते हैं—
1. स्नान और शुद्धि
श्राद्ध कर्म से पहले स्नान करके शुद्ध होकर संकल्प लिया जाता है।
2. संकल्प
जिस पितर के लिए श्राद्ध किया जा रहा है, उनका नाम और परिवार की परंपरा के अनुसार संकल्प किया जाता है।
3. तर्पण
जल में काले तिल आदि मिलाकर पितरों को जल अर्पित किया जाता है।
4. पिंडदान
चावल आदि से बनाए गए पिंड पितरों के नाम से अर्पित किए जाते हैं।
5. भोजन
परंपरा के अनुसार ब्राह्मण भोजन कराया जाता है तथा गाय, कौए आदि को भी भोजन कराने की प्रथा है।
6. दान
अन्न, वस्त्र, दक्षिणा तथा आवश्यकता की वस्तुओं का दान किया जाता है।
7. प्रार्थना
अंत में पितरों की शांति और परिवार के मंगल की प्रार्थना की जाती है।
धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध के दौरान पिंड, तर्पण और भोजन से संबंधित विभिन्न विधियों का वर्णन मिलता है।
श्राद्ध में कौए को भोजन क्यों कराया जाता है?
भारतीय लोकपरंपरा में कौए को पितरों का प्रतीक माना गया है।
इसलिए श्राद्ध के भोजन का एक हिस्सा कौए के लिए निकाला जाता है।
मान्यता है कि यदि कौआ भोजन ग्रहण करता है तो इसे पितरों की स्वीकृति और संतुष्टि का शुभ संकेत माना जाता है।
यह धार्मिक प्रतीकात्मकता है और अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी परंपराएं अलग हो सकती हैं।
क्या केवल पिंडदान ही जरूरी है?
पितृ पक्ष का अर्थ केवल पिंडदान करना नहीं है।
यदि कोई व्यक्ति किसी कारण से विस्तृत श्राद्ध कर्म नहीं कर सकता तो अपनी क्षमता के अनुसार—
जल अर्पित करना, अन्नदान करना, गरीब या जरूरतमंद को भोजन कराना, गौ सेवा करना, पक्षियों को दाना देना और अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना
भी कृतज्ञता की भावना को व्यक्त करने के तरीके माने जाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात है श्रद्धा और भावना।
पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए?
पितृ पक्ष को सामान्यतः संयम और सात्त्विकता का समय माना जाता है।
परिवार और परंपरा के अनुसार लोग इस अवधि में—
- मांसाहार से बचते हैं
- मदिरा से दूर रहते हैं
- अनावश्यक उत्सव से बचते हैं
- सात्त्विक भोजन करते हैं
- क्रोध और विवाद से बचने का प्रयास करते हैं
- जरूरतमंदों की सहायता करते हैं
- पितरों का स्मरण करते हैं
हालांकि अलग-अलग समुदायों और परिवारों की परंपराओं में नियम अलग हो सकते हैं।
क्या पितृ पक्ष केवल डर का समय है?
कई बार पितृ पक्ष को लेकर लोगों में भय पैदा कर दिया जाता है कि यदि श्राद्ध नहीं किया तो परिवार में अनर्थ होगा या कोई बड़ा नुकसान हो जाएगा।
लेकिन पितृ पक्ष को केवल भय की दृष्टि से देखना इसके मूल भाव को छोटा कर देता है।
इस परंपरा का एक सुंदर सामाजिक और भावनात्मक पक्ष भी है।
यह हमें याद दिलाती है कि—
हम अकेले नहीं हैं।
हमसे पहले भी कई पीढ़ियां इस संसार में रही हैं। उन्होंने परिवार बनाया, संघर्ष किया, घर बसाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाया।
पितृ पक्ष उन सभी के प्रति धन्यवाद कहने का अवसर है।
पितृ पक्ष और हमारी संस्कृति
आज के आधुनिक जीवन में परिवार छोटे हो गए हैं। कई बार बच्चों को अपने दादा-दादी या उससे पहले की पीढ़ियों के बारे में भी बहुत कम जानकारी होती है।
पितृ पक्ष हमें अपनी वंश परंपरा और पारिवारिक इतिहास को जानने का अवसर देता है।
इस दौरान परिवार बैठकर पुराने लोगों की बातें करता है—
“हमारे दादा कैसे थे?”
“परदादा का गांव कहां था?”
“हमारे परिवार में कौन-कौन से लोग पहले थे?”
“उन्होंने परिवार के लिए क्या किया?”
इस तरह श्राद्ध केवल धार्मिक कर्म नहीं रहता, बल्कि परिवार की स्मृतियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की परंपरा भी बन जाता है।
पितरों को याद करने का सबसे सुंदर तरीका
पितरों के लिए सबसे बड़ा सम्मान केवल किसी एक दिन भोजन कराना नहीं, बल्कि उनके अच्छे संस्कारों को अपने जीवन में उतारना भी है।
यदि हमारे पिता ने ईमानदारी सिखाई थी तो ईमानदारी से जीना ही उनके प्रति सम्मान है।
यदि मां ने दया सिखाई थी तो किसी जरूरतमंद की मदद करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
यदि दादा-दादी ने परिवार को जोड़े रखा था तो परिवार को साथ रखना ही उनके प्रति सम्मान है।
इस अर्थ में—
पितरों का श्राद्ध केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उनके अच्छे संस्कारों को भविष्य तक पहुंचाना है।
2026 में पितृ पक्ष क्यों विशेष है?
2026 का पितृ पक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा।
इन दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करेंगे। विशेष रूप से गया जी जैसे पवित्र तीर्थों में पिंडदान करने के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने की परंपरा है। गया की आधिकारिक पितृ परंपरा में 2026 का पितृपक्ष मेला 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक बताया गया है।
गया जी में पिंडदान की परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सदियों पुरानी तीर्थ परंपरा का हिस्सा है।
निष्कर्ष: पितृ पक्ष हमें क्या सिखाता है?
पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है।
यह हमें बताता है कि जिस परिवार, समाज और जीवन का हिस्सा हम आज हैं, उसके पीछे अनगिनत लोगों का योगदान है।
हमारे पूर्वज आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, संस्कार, परंपराएं और उनके द्वारा बनाए गए परिवार आज भी हमारे साथ हैं।
इसीलिए पितृ पक्ष में किया गया श्राद्ध केवल एक धार्मिक कर्म नहीं बल्कि—
श्रद्धा है।
कृतज्ञता है।
स्मरण है।
परिवार की जड़ों से जुड़ने का अवसर है।
और शायद यही इस पूरी परंपरा का सबसे सुंदर संदेश है—
“जो हमें इस संसार में लाए, उन्हें याद करना हमारा धर्म भी है और हमारा संस्कार भी।”
पितृ देवताओं को नमन।
ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
FAQ
1. श्राद्ध पक्ष 2026 कब से शुरू होगा?
2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर 2026 से शुरू होकर 10 अक्टूबर 2026 तक रहेगा। अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या होगी।
2. सर्वपितृ अमावस्या 2026 कब है?
10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी।
3. गया जी में पिंडदान क्यों किया जाता है?
गया जी को सनातन परंपरा में पितरों के लिए अत्यंत पवित्र तीर्थ माना जाता है। विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी, सीता कुंड और अक्षयवट यहां की पिंडदान परंपरा से जुड़े प्रमुख स्थल हैं।
4. क्या माता सीता ने गया में पिंडदान किया था?
गया की धार्मिक परंपरा के अनुसार माता सीता ने फल्गु नदी के किनारे अपने ससुर राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। गया का सीता कुंड इसी मान्यता से जुड़ा है।
5. क्या पितृ पक्ष में पूर्वज धरती पर आते हैं?
यह सनातन धर्म और लोकपरंपरा से जुड़ी मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितर पृथ्वी लोक के निकट आते हैं और उनके वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान को स्वीकार करते हैं। इसे धार्मिक आस्था के रूप में समझा जाता है।
6. यदि पितर की मृत्यु तिथि पता न हो तो क्या करें?
ऐसी स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की परंपरा है।
7. क्या पितृ पक्ष केवल हिंदू धर्म की एक रस्म है?
यह सनातन हिंदू परंपरा में पूर्वजों के सम्मान और स्मरण का विशेष काल है। इसके साथ धार्मिक कर्मकांड के अलावा परिवार, स्मृति, दान और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव भी जुड़ा हुआ है।
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